ठग्सऑफहिंदोस्तान I Thugs of Hindustan Candid I Unbiased review I MankindNews

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Candin and Unbiased review Review of Bollywood movie ठग्सऑफहिंदोस्तान I Thugs of Hindustan - Arvind Rautela


2018 की बड़ी फिल्मों में एक और आमिर खान की एकमात्र फ़िल्म ठग्स ऑफ हिंदोस्तान 8 नवंबर बृहस्पतिवार को रिलीज हुई। निर्माता पैसा लगाता है कलाकार और फ़िल्म की यूनिट रात दिन एक करके फ़िल्म बनाती है तो छुट्टियों के मौके पर शुक्रवार के बजाय किसी भी दिन फ़िल्म रिलीज़ करने का वितरक का पूरा पूरा हक है। फ़िल्म को पहले दिन जबरदस्त ओपनिंग मिली लेकिन अचानक इंटरनेट पर इस फ़िल्म का नकारात्मक प्रचार शुरू हो गया। अलग अलग चीजें वायरल और ट्रेंड करने लगीं। तथाकथित महान एवं फ़िल्म पंडित ठग्स ऑफ हिंदोस्तान को निराशाजनक करार दे चुके थे जबकि इन लोगों ने #लवयात्री #राब्ता #संजु आदि में बड़ी आशा जाहिर की थी। कोई फ़िल्म खराब नहीं होती एक प्रयोग होती है हुआ तो सफल वर्ना सबक।लेकिन किसी फिल्म को लेकर इतना झूठा प्रचार कि कहानी नहीं है, मल्टी स्टार कास्ट लड़खड़ा गयी है, नृत्य, एक्शन, VFX सब बकवास है। तो भाइयों बहनों आदरणीय यश चोपड़ा की विरासत संभाल रहे यशराज फिल्म्स वाले ढक्कन नहीं है। जो भारत की कुल 6 हज़ार स्क्रीन्स में से 5 हज़ार स्क्रीन्स बुक कर एक फ़िल्म पर पैसा झोंक रहे। व्यापारी कंटेंट भी परख लेता है और फ़िल्म की महक से दर्शकों का झुकाव भी। फिर जिस फ़िल्म में महानायक अमिताभ बच्चन, साल में एक फ़िल्म करने वाले आमिर खान, तनु वेड्स मनु और रांझणा फेम मोहम्मद जीशान अय्यूब जैसे चरित्र अभिनेता हों उसको बिना देखे किसी की भी नज़र या इरादे से खराब कैसे मान लेंगे। फ़िल्म खराब है देखने लायक नहीं है कहना सबसे आसान है। और आसान काम अमूमन हम लोगों की फितरत में शामिल है खैर मैंने फ़िल्म का 2nd डे 2nd शो देख लिया है। मेरी समीक्षा आप सबों के लिए पेश कर रहा हूँ। स्पष्ट करता हूँ कि फ़िल्म जरूर देखियेगा तब ओपिनियन बनाइएगा की फ़िल्म कैसी है। आज के दौर में कुछ ले दे के फ़िल्म को फ्लॉप तो हिट भी घोषित कर दिया जाता है। बाकी पौने 3 घन्टे की फ़िल्म आपको कतई बोर न करेगी इसकी गारंटी Mankindnews  लेता है।



Review-
1795 का हिंदोस्तान है। उसी में एक रियासत है रौनकपुर उसके राजा हैं मिर्जा सिकंदर बेग (रोनित रॉय)। सात समंदर पार से आये कुछ इंग्लिश कंपनी वालों ने लगभग हर रियासत को कब्जे में ले लिया है और वहां कंपनी का शासन चलता है मिर्जा बेग को कंपनी का नेतृत्व कर रहे क्लाइव की गुलामी नामंजूर है। एक दिन धोखे से क्लाइव मिर्जा बेग की 8 साल की बेटी के सामने मिर्जा के पूरे परिवार को खत्म कर देता है। लेकिन आठ साल की ज़फीरा को मिर्जा का सेनापति और सबसे विश्वसनीय खुदाबख्श जहाजी (अमिताभ बच्चन) सुरक्षित निकाल लेता है।



वह जफीना को पूरी तरह सैन्य कौशल में पारंगत कर परवरिश करता है। मिर्जा का शासन खत्म होने पर खुदाबख्श आज़ाद नाम से एक दल का गठन कर कंपनी के ख़ज़ानों को बार बार लूटकर क्लाइव के साम्राज्यवाद के खिलाफ हमेशा आफत के तौर पर खड़ा होता है।


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इस हिंदोस्तान में एक किरदार और है जो सिर्फ अपने लिये जीता है मर अपने बाप के लिए भी न सकता। न काहू से दोस्ती न काहू से बैर का चोला ओढ़े फिरंगी मल्ला, गोपालपुर जिला कानपुर अवध के किरदार में इतने रंग है जो आपको कभी एक सेकंड को भी बोर न होने देंगे। उसके दो ही खास हैं एक है नर्तकी सुरैया जान( कटरीना कैफ) दूसरा शनिचर (मोहम्मद जीशान अय्यूब)। फिरंगी अपने फायदे के लिए इन दोनों को भी बेच सकता है। उसके लिए यह भी फिट है कि ऐसा कोई सगा नहीं जिसे मैंने ठगा नहीं। खुदाबख्श की आज़ाद आर्मी को कंपनी से चोरी छुपे अन्य गुलाम रियासतें भी मदद करती हैं। आज़ाद को पकड़ने के लिये क्लाइव अपने एक जूनियर अफसर को कहता है जिस पर फिरंगी मल्ला को कुछ इनाम की शर्त पर आज़ाद की गिरफ्तारी का काम सौंपा जाता है। तो क्या फिरंगी मल्ला आज़ाद को पकड़कर क्लाइव को सौंप देगा, क्या आज़ाद फिरंगी के इरादे जान लेगा और उसकी हत्या कर देगा या क्या होगा इस फ़िल्म का अंत। इसी पर फ़िल्म चलती है। फ़िल्म का पहला हाफ तो एकदम सॉलिड है स्क्रिप्ट, डायलॉग और एक्शन के साथ म्यूजिक आपको कुर्सी और स्क्रीन के बीच से हिलने न देगा।

विजय कृष्ण आचार्य जो इससे पहले धूम सिरीज़ की फिल्मों का निर्देशन कर चुके हैं उनको बधाई कि वह फ़िल्म में एक्शन का तड़का लगाने में पूरी तरह कामयाब हुए हैं। फ़िल्म के संवाद भी गहरे अर्थों वाले हैं कहीं से भी बोर न करते इवन फेसबुक, Whatsapp के स्टेटस बनाने लायक हैं। अब एक्टिंग की बात कर लें तो सबसे पहले जाहरा वसीम शेख के अभिनय पर बात होगी क्योंकि वो सबसे छोटी हैं। ज़फीरा बेग का ग्लैमर और एक्शन लेडी का जो कॉम्बो निर्देशक ने उनसे निकलवाया है वो बढ़िया लगा। मणिकर्णिका की झांसी की रानी को ये कड़ी टक्कर देगी। साथ ही उनसे एक्शन और एक्सप्रेशन अधिक करवाया है संवाद कम दिए हैं। मोहम्मद जीशान अय्यूब ने शनिचर के किरदार को इतना रंगीन किया है मजा आ गया वाह, जब आप आमिर खान के साथ स्क्रीन साझा करें और महफ़िल लूट लें तो इसी को कलाकार कहते हैं।



क्लाइव के किरदार में लॉयड own परफेक्ट हैं। महानायक ने खुदाबख्श के किरदार को एक मिसाल के तौर पर पेश किया है। अपनी हर छवि को तोड़कर एक नई छवि गढ़ लेना शायद यही अमिताभ बच्चन का USP है। एक्शन दृश्यों में वह कहीं पर भी अपनी उम्र से आधे चरित्रों पर हल्के न पढ़े हैं। बेहद यादगार फ़िल्म उनके अभिनय के साथ साथ गहरे संवादों के लिए। इस फ़िल्म का मुख्य किरदार है फिरंगी मल्ला का। प्याज के छिलकों की तरह परतदार है। वो आपको इतना engage करता है कि आप सोच भी न सकते ये अगले पल क्या करने वाला है इसलिए फ़िल्म क्लाइमेक्स तक कमजोर न पढ़ती। सस्पेंस बना रहता है। कटरीना सुंदर हैं सेक्सी हैं उनको फ़िल्म में सिर्फ eye कैंडी तक ही सीमित रखा गया। लेकिन उनका यह कहना कि बंद कमरे में इश्क करने वाले यहां रोज आते हैं, इस इश्क से पेट भरता है दिल नहीं। घायल कर गया। बाकी सेकंड हॉफ के खुदा -ऐ- मंजूर आइटम सॉन्ग में उन्होंने वाहियात एक्सपोज़ किया। ये बेकार था। फ़िल्म के स्क्रीनप्ले में 20 प्रतिशत खामियां हैं जिन्हें दूर किया जा सकता था। लेकिन अगर मनोरंजन की बात करें तो यह फ़िल्म कहीं से भी एक प्रतिशत निराश न करती है। 



ज़फीरा और खुदाबख्श के बीच का इमोशनल शॉट, खुदाबख्श और फिरंगी के बीच संवाद, मिर्जा बेग-क्लाइव के बीच का संवाद फ़िल्म की जान हैं। मिर्जा असलम बेग से संधि के प्रस्ताव पर
क्लाइव का कहना कि मौकापरस्त हूँ, आने वाले समय मे हर बादशाह की डोर बनिए के हाथ में होगी फ़िल्म का हासिल-ए-महफ़िल है। तो बिना कुछ सोचे या अफवाहों पर ध्यान दिए बगैर ठग्स ऑफ हिंदोस्तान देख आइए फिर अक्ल लगाइए की अब तक खराब है खराब है के नाम पर कौन आपको गुमराह कर रहा था।

Candin and Unbiased review  Review of Bollywood movie ठग्सऑफहिंदोस्तान I Thugs of Hindustan - Arvind Rautela with top movie reviewer Mamta Bhandari 

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